‘तफ्तीश’ (Enquiry)

“तफ्तीश में गुज़र गई वो शाम मेरी,
तफ्तीश में गुज़ार दिया अरसा भी,
ना वो आया, ना उसकी कोई खब़र,
बादल बिन मौसम गरज भी गया,
बादल बिन मौसम बरसा भी,
बरसात के पानी में भिगोकर रखें पांव देर तक,
रात में लिखा उसे काग़ज़ पर, याद किया सवेर तक,
रेत-सा वो सपना, छूट गया, टूट गया,
बेबाकी सा मिजाज़ उसका,
कभी बोल लिया, कभी रूठ गया,
चार ग़ाम की दूरी, मीलों में तब्दील हो गई,
उसको न ढूंढ सकी, खुद को भी खो गई,
हर बार सवाल उठाए गए मेरे जज़्बात पर,
माथा सिकोड़ा था उसने मेरी हर बात पर,
हाथ थामने को बढ़ी जब भी मैं उसकी तरफ़,
हँस दिया हर बार वो मेरे ही हालात पर,
याद आज भी आता है वो,
और परेशान ही हो जाती हूँ,
तफ्तीश में नहीं लगती,
लेकिन,
खुदमें बंध सी जाती हूँ,
चुप रह जाती हूँ,
और रो भी नहीं पाती हूँ…”

© निशा मिश्रा

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