‘No matter what’

“No matter what!
That’s the problem, right? With everything, or say, in everything. You decide something, and then you absorb yourself in it. Inside out, you keep moving ahead, telling yourself, reminding yourself that very thing.
No matter what!
I have to do it. I have to get there, no matter what. And that is it.
That reminder keeps swirling inside, and pounds all over. You try to shove it down but it slips and scatters, in you, around you and everywhere possible.
Isn’t it strange?
That reminder?
Isn’t that the actual reason?
For everything?
For every effort one puts in to live, love?
For every step that is taken?
For every decision made and yet to be made?
For everything felt, yet to be felt?
For everything that happens?
For everything? EVERY SINGLE THING? True.
Strange. Very strange indeed.
‘No matter what’. Well played!”

© Nisha Mishra

‘बुखार? ठीक हो जाएगा!’

“चादर रंग की फीकी,
काली मिर्च डला, काढ़ा,
बुखार से तपता बदन,
चमड़ी का रंग भी हो रहा, गाढ़ा,
सी सी कर फूंकी, बेस्वाद दलिया,
सूती कपड़ा भी मत्था सेंकने को फाड़ा,
सहलाया प्यार से गाल,
उबाली हल्दी डालकर अरहर की दाल,
रोटी के टुकड़े और चीनी सनाई, दूध में,
कंघा लगा, सुलझाए उलझे बाल,
चढ़ा है आज बुखार,
मिल भी तो रहा है इतना दुलार,
बुखार है?
कोई नहीं, ठीक हो ही जाएगा,
आया, चढ़ा है,
तो चला भी जाएगा,
उतर भी जाएगा!!”

© निशा मिश्रा

‘चिटकनी’ (the lock)

“अंदर से बंद कमरे के एक कोने में बैठी थी मैं,
यूँही,
ताक चली गई खिड़की से बाहर,
ध्यान आया,
घर बहुत दूर है तुम्हारा,
एक आह भरी,
और ध्यान वापस कमरे में ले आई,
कमरे को ही देखा,
फीके रंग की दिवारें,
एक तरफ़ से सटी मेज़,
उसपर रखी दो डायरी,
तह लगे कुछ जोड़ी कपड़े,
कुछ खुले काग़ज़, कलम,
और अड़ी हुई वो ‘चिटकनी’,
आँखें घुमाई और फिर मूंद लीं,
नज़र एक बार फिर गई, दरवाज़े पर,
तुम भी ऐसे ही थे ना?
अड़े हुए, बंद-बंद से?
घंटों ताकती रही उसी चिटकनी चढ़े दरवाज़े को,
मन भी भर आया,
मग़र आँखें सूखी ही रहीं,
दिवार से पीठ सटाए बैठ गई,
सोचा कि खत ही लिख दूँ तुम्हें,
मग़र फिर ध्यान आया, घर बहुत दूर है तुम्हारा,
और फिर पता भी कहाँ मालूम था तुम्हारा!!”

© निशा मिश्रा

‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’

“बात निकलके दूर तलक गई सही,
पूछा उदासीं का सबब कई लोगों ने भी,
परेशां-सी शक्ल लिए, हम चुप ही रहे,
सूखे बालों की तरफ़, उँगलियाँ भी उठीं,
गुज़रे हुए सालों का हिसाब भी मांगा गया,
तंज़ भी कसा गया, ताना भी सुनाया गया,
फ़िकरे कसते लोग, चूके नहीं तुम्हारा नाम लेने से,
बातों बातों में तुम्हारा ज़िक्र भी लाया गया,
असर क्या लेते उनकी बातों का, जब तुम नहीं थे साथ,
चेहरे पर तासूर भी नहीं आए, तुम जो नहीं थे पास,
सवालात से परहेज़ ही किया हमने,
आख़िर यही सलाह तो दी थी हमें, तुमने,
बात निकलकर दूर तलक गई तो सही,
बातें बनी कई, बस एक तुम तक ही पहुंची नहीं..”

© निशा मिश्रा